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The Thought Leakage

Writings of Expressions and Experiences

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Poem

When did I die?

I walk past another milestone,

Of holding the emotions

Within the dark corners

Where no torch bearer’s efforts shall pay.

 

I stay in the closet,

where things lay cosy,

warned by all of a treason

to the mind, soul, heart.

 

I whisper the agony,

in the undertones of melody.

Lost in the monotony so deep,

I pray someone to,

Remind me, of the day I died.

 

 

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हमार बोली—भोजपुरी!

कई बरस हुए घर गए। घर यानि वो जगह जहाँ सब अपने रहते हो। अपनों के साथ ही तो रह रही हूँ, फ़र्क इतना है कि जहां के हम हैं वहाँ नहीं हूँ। और उस जगह यानि, जहाँ हमारी पुश्तें रहती आई थीं, वहाँ जब आखिरी बार गई थी एक नज़र मारने और उस ख़ूबसूरत से अनछुए गाँव में ख़ुद का अस्तित्व पहचानने तो पाया कि अपने अविकसित होने कि छाप छोड़ वहाँ बाकि सब बदल रहा था। और इन सब में सबसे पहले जो कुछ छूट रहा था, उसमें भाषा अव्वल नंबर पर थी। मेरी भाषा भोजपुरी की।

घर में ब्याह था, पुरानी आँगन वाली शैली में बने घर में महक आ रही थी देसी खास पकवानों की। सोहर गाए जा रहे थे। गारि गाई जा रही थी। भला गारि भी कोई गाने की चीज़ होती है? बिल्कुल, आइए कभी आज़मगढ़, देवरिया, बलिया या गोरखपुर, और मज़ा लें इस गुड़ सी मीठी ज़ुबान का जिसमें गालियाँ भी गाकर बड़े प्यार से मारी जाती हैं, और उतने ही प्रेम से उनको सुना भी जाता है। यहाँ ब्याह एक घर में नहीं होता, पूरा गाँव एक-एक चीज़ जुटाकर हिस्सा बनता है। जहाँ की भाषा सिर्फ भारत के ही कई प्रांतों में नहीं, बल्कि विश्व के कई देशों में बोली जाती है और जिसकी कुछ सौ वर्षों पहले तक अपनी लिपि भी थी।

कजरी, लाचारी, गारि, होरी, सोहर, निर्गुण और ऐसी कई और गीत शैलियाँ जो आपने कभी नहीं सुनी हों। निर्गुण का अगर सबसे करीबी पर्याय ढ़ूँढ़ा जाए तो वो सूफी होगा। पर फिर भी सूफियाना अंदाज़ से कहीं अलग। अपने आँचल में भोजपुरिया समाज कई रहस्य दबाए हुए है जो कहीं रोज़ बन रहे और बड़े शौक से मज़ाक उड़ाए जाने वाले ‘मीम्स’ में कुचला जा चुका है। वो सोशल पोस्ट्स जिनमें कहा जाता है कि देखो, यदि भोजपुरी में यह फिल्म होती तो शीर्षक कुछ एस तरह का होता। और आप जनाब इस बे-सिर-पैर के पोस्ट में ठहाके लगा-लगा दोस्तों को टैग करते हैं, ये बिना जाने कि जो आप को परोसा गयो है, वो भोजपिरी नहीं। जनाब, यह भाषा ‘ठीक बा’ से कहीं गहरी है। इसकी संस्कृति भी किसी और समाज और भाषा जौसी विस्तृत और अथाह है।

Continue reading “हमार बोली—भोजपुरी!”

बहती स्याही

लिखती हूँ आज,
निब तोड़
स्याही से,
काग़ज़ पर फैल रही स्याही से|
चूंकि छंद-बद्ध नहीं कर सकती भावनाओं को
फैली स्याही लिखती मेरे भावों को|
कहती जो मैं कहती
बहती ज्यों मैं बहती|
बेरोक, बेटोक, बिन अंकुश
भिगोती जीवन के काग़ज़ को |
माना कि पढ़ने को नग़में नहीं लिखेगी
बहती स्याही
माना कि तुम्हे कुछ कह ना पाए
बहती स्याही|
बहकर वो बेकार होगी,
काग़ज़ को भी बर्बाद करेगी
पर मेरे भावों को साकार करेगी,
वो शब्दों का जाल पार करेगी|
कई बार रोए हैं ख़ुद,
आज टूटे पेन को को भी रोने देते हैं|

दैव्य तुम हो

तुम सौम्य हो, सौंदर्य हो
रौद्र का पर्याय तुम ही
शृंगार रस का मूल तुम हो
वीर सींचती राग तुम हो
विजय शंख नाद तुम हो
हर युद्ध में कलंकित
हार का अभिषाप तुम हो
महापुरूषों के दाह की
द्रौपदी, जानकी तुम्ही हो
आत्मा की क्रूरता से साक्षर
देह का व्यापार तुम हो
वात्सल्य हृदय है तुम्हारा
क्षमा का भंडार तुम हो
प्रसूती की पीड़ा तुम हो
आँगन की लज्जा तुम हो
प्रियतम से चोट खाई
आँचल छिपाती तन नील तुम हो
अश्रू को आँख तिनका बताती
ब्याहता भी तुम ही हो
गंभीर तुम हो, धीर तुम हो
एक कलेजे में संसार बाँधती
विफल हाथों को संकल्प बाँटती
प्रियसी तुम हो, मातृ तुम हो
हो अथक संयमी तुम्ही
तद्दपि पौरूष का अपमान तुम हो
वैराग्य का काल तुम हो
परम पराक्रमवान तुम ही
फिर भी तेज हारती यौवन तुम्ही
करूणा का, कौशल का, कर्तव्य का
माप तुम ही,
निःसंदेह दैव्य तुम ही
निःसंदेह दैव्य तुम ही!

आग लगी

अहो क्या बात हुई
कि घर लड़की ना आई
कहीं दिवानी फिरती वो
नाम डुबा ना आई|
बरसाती आधी रात गई
ना ख़बर करी
कई परवाने हुआ होंगे
जो बला बुलाती कहीं
उन्हीं में उसकी रात कटी?
लगे पड़ोसी बात बनाने
कि क्या बात हुई,
कि रात गई पर
घर लड़की ना आई?
पिता आँख फिर अनल भरी
जो आई ना भीतर एक घड़ी
तो मुहँ फेरे उल्टे लौट चले
जो आ गई नज़र, गर हाथ पड़ी
तो ख़ुदा ख़ैर करे उसकी
वो दोज़ख की आग जले |
आग जले, आग जले|
गला कलम ना किया अगर,
तो मैं भी उसका बाप नहीं|

पानी पर बसा शहर

पानी पर बसा शहर,

चादर कोहरे की ओढ़े

किनारों पर स्नेहातुर कमल खिले,

बाह्य शांत, भीतर अस्थिर

तरल भावनाओं का

शहर अभिलाशाओं का

कोहरा वेदनाओं का

और कमल है उनका जो पार कर चले ये शहर,

और पहुँचे हैं तृप्तिमय सीमा पर |

कब कहोगे?

शोर मचा था कुनबे में

फ़िर भी दिल में सन्नाटा

कहने को सौ बातें थी

फ़िर भी मुहँ पर है ताला

भला कौन सुनता उसकी

जब गूँजें औरों की स्वर-माला |

Continue reading “कब कहोगे?”

शांति सेना

बचा लो, बचा लो,

ये जो चंद जानें बची हैं,

जिन्हें कुचल जाने को कई आतुर हुए हैं

Continue reading “शांति सेना”

कॉलेज की बिल्डिंग

यादें टूट रहीं हैं, कॉलेज की बिल्डिंग बदल रही है,

नए नए रंग लग रहे, नई ईमारत, नए पेड़

नया सा सब ख़ूब सलोना, बस एक नहीं यादों का कोना |

कहाँ रही बरगद की छैयाँ, कहाँ गया वो रेडी वाला,

कहाँ रही सोसाइटी की गलियाँ, नहीं रहा एचओडी का वो कमरा,
कहाँ गया कमेटी की अड्डा? आह! अब सब बदल चुके!

लोगों की अब चाल अलग है, बातों का अंदाज़ अलग है

नया नया फैशन है, नए बहानें, नया हॉस्टल

नया सा सब ख़ूब सलोना, बस एक नहीं यादों का कोना |

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