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The Thought Leakage

Writings of Expressions and Experiences

माँ, मिला सकूं तुझसे आँख

आइना देखुं मैं कैसे
हर रंग में तू नजर आती है अम्मा
भावों के मरुस्थल से इस चेहरे की
आँखें आइने में तेरी छवि दिखाती हैं
और देखते ही देखते भीग जाता है ये मरुस्थल तेरे वात्सल्य की याद में

कभी तुझ सी बन पाउं
कभी तुझ सा धीरज पाउं
उम्र सत्रह पर जो ख्वाब खोएं
उनकी याद में हर दिन आँसू ना बहाउं
कैसे कर गई तुम ये सब
मेरे पल भर के बचपन ने
तुम्हारा पूरा यौवन ले लिया
कुछ ख्वाब तुमने भी देखें होंगे
शायद मैं ही उस राह की मोड़ रही होउं
बोलो, तुम जैसा धीरज कैसे पाउं?

आइना कहता है कि प्रेरणा लूं मैं तुमसे
विरासत में मिली तुम्हारी आँखों का मान रखुं मैं
पर जो बलिदान दिए तुमने
वो प्रेरणा स्रोत बनाना सही है?
क्या अपनी हार में जीत खोजना सही है?

या प्रेरणा लूं कुछ ऐसे कि
मेरी जीत तेरी ये आँखें मुझपर देख सकें
एक स्त्री कल्पना जो तुमने की
वो सक्षम स्वप्न बनूं मैं
मैं बनूं तेरा विजय नाद
मैं देख इस आइने में
मिला सकूं तुझसे आँख

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कफ सिरप

तीन दिन से लगातार खाँसी और जब घर पर बात करते वक्त इसे छिपाना मुश्किल हुआ, तब आखिरकार केमिस्ट की दुकान का रुख किया गया और बड़ी तहकीकात कर एक कफ सिरप लिया गया। सवाल खुछ ख़ास नहीं सिर्फ इतने कि भला सूखी खांसी के लिए कौन सी है और कफ के लिए कौन सी। इसे पीकर नींद तो नहीं आएगी? भला दफ्तर में सोते हुए पकड़े गए तो कौन सुनेगा ये बहाना कि कम्बख़्त ये सिरप दोषी है। या सोए नहीं तो बोझिल आंखों में कोई गलती कर दी तो भी गला ही पकड़ा जाएगा, सिरप नहीं।

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चाँद पकड़ते हैं

चलो चाँद पकड़ते हैं
अम्मा से कहकर
एक जाल बुनते हैं
सुबेरे जब कोई उसे ताके ना,
झट जाकर चाँद पकड़ते हैं।

आज नहीं,
आज आधी खाई पूरी सा है
जब अम्मा सिल चुकी हों जाला,
छिपा कर रखने को दे दें एक थैला
चलो फिर चाँद पकड़ते हैं।

पिताजी कहते हैं कि
एक बूढ़ी अम्मा रहती हैं वहाँ
थैले में तो वो ना आएँगी!
दादी से कह उनके लिए
एक छप्पर डलवाते हैं
चलो फिर चाँद पकड़ते हैं।

मौसी से कहा आज
चलो चाँद पकड़ते हैं
तो बोलीरे पगले
क्यों मामा को तू सताएगा?
आते वो हर रोज़ सिरहाने
उन्हें क़ैद कर लाएगा!

क्यों मानूं कि हर रोज़ हैं आते

और आते तो होम-वर्क क्यों नहीं कर जाते?

हो गई ये तो खूब ढिठाई!

आज तो बरसा है दो गांव तक पानी

जो दिखा आज उस काली चादर पर

त्यों झट चांद पकड़ते हैं।

आ गया आ गया

चलो पकड़ते हैं

छिप रहा था इस कपास के दस्ते के पीछे

और लाया है ये संग तारा एक

नहीं बचोगे बच्चू आज,

बाबा के कहने पर भी।

चलो बंटी, चाँद पकड़ते हैं।

ये कैसी लुका-छिपी?

जहां-जहां पानी, वहां-वहां चाँद!

इत्ते में मेरा वाला कौन भला?

पूँछू किससे कि दें सज़ा किसे?

अरे, ये तो बाद कहानी है,

पहले धर तो ले किसी एक को,
कहीं भाग गया तो?
ज्यों लपके उसपर,
छलक गया पानी और
बिखर गया चाँद!

मुंबई के नाम

चमक रहा है शहर

रात के अंधियारे में

छवि उभरती सागर में फिर

बिखर-बिखर सी जाती है।

जलती है हर रोज़ इमारत

जुगनुओं की अभिलाषा में।

 

लड़ियां लगी किनारे भी

घर की याद दिलाती हैं

बरसों पहले की दिवाली,

हर बरस बुलाती है।

क्यों वहीं मनेगी ईद कि घर आओगे

कहो कि रात मृगतृष्णा छोड़,

घर दिए जलाने आओगे।

When did I die?

I walk past another milestone,

Of holding the emotions

Within the dark corners

Where no torch bearer’s efforts shall pay.

 

I stay in the closet,

where things lay cosy,

warned by all of a treason

to the mind, soul, heart.

 

I whisper the agony,

in the undertones of melody.

Lost in the monotony so deep,

I pray someone to,

Remind me, of the day I died.

 

 

हमार बोली—भोजपुरी!

कई बरस हुए घर गए। घर यानि वो जगह जहाँ सब अपने रहते हो। अपनों के साथ ही तो रह रही हूँ, फ़र्क इतना है कि जहां के हम हैं वहाँ नहीं हूँ। और उस जगह यानि, जहाँ हमारी पुश्तें रहती आई थीं, वहाँ जब आखिरी बार गई थी एक नज़र मारने और उस ख़ूबसूरत से अनछुए गाँव में ख़ुद का अस्तित्व पहचानने तो पाया कि अपने अविकसित होने कि छाप छोड़ वहाँ बाकि सब बदल रहा था। और इन सब में सबसे पहले जो कुछ छूट रहा था, उसमें भाषा अव्वल नंबर पर थी। मेरी भाषा भोजपुरी की।

घर में ब्याह था, पुरानी आँगन वाली शैली में बने घर में महक आ रही थी देसी खास पकवानों की। सोहर गाए जा रहे थे। गारि गाई जा रही थी। भला गारि भी कोई गाने की चीज़ होती है? बिल्कुल, आइए कभी आज़मगढ़, देवरिया, बलिया या गोरखपुर, और मज़ा लें इस गुड़ सी मीठी ज़ुबान का जिसमें गालियाँ भी गाकर बड़े प्यार से मारी जाती हैं, और उतने ही प्रेम से उनको सुना भी जाता है। यहाँ ब्याह एक घर में नहीं होता, पूरा गाँव एक-एक चीज़ जुटाकर हिस्सा बनता है। जहाँ की भाषा सिर्फ भारत के ही कई प्रांतों में नहीं, बल्कि विश्व के कई देशों में बोली जाती है और जिसकी कुछ सौ वर्षों पहले तक अपनी लिपि भी थी।

कजरी, लाचारी, गारि, होरी, सोहर, निर्गुण और ऐसी कई और गीत शैलियाँ जो आपने कभी नहीं सुनी हों। निर्गुण का अगर सबसे करीबी पर्याय ढ़ूँढ़ा जाए तो वो सूफी होगा। पर फिर भी सूफियाना अंदाज़ से कहीं अलग। अपने आँचल में भोजपुरिया समाज कई रहस्य दबाए हुए है जो कहीं रोज़ बन रहे और बड़े शौक से मज़ाक उड़ाए जाने वाले ‘मीम्स’ में कुचला जा चुका है। वो सोशल पोस्ट्स जिनमें कहा जाता है कि देखो, यदि भोजपुरी में यह फिल्म होती तो शीर्षक कुछ एस तरह का होता। और आप जनाब इस बे-सिर-पैर के पोस्ट में ठहाके लगा-लगा दोस्तों को टैग करते हैं, ये बिना जाने कि जो आप को परोसा गयो है, वो भोजपिरी नहीं। जनाब, यह भाषा ‘ठीक बा’ से कहीं गहरी है। इसकी संस्कृति भी किसी और समाज और भाषा जौसी विस्तृत और अथाह है।

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बहती स्याही

लिखती हूँ आज,
निब तोड़
स्याही से,
काग़ज़ पर फैल रही स्याही से|
चूंकि छंद-बद्ध नहीं कर सकती भावनाओं को
फैली स्याही लिखती मेरे भावों को|
कहती जो मैं कहती
बहती ज्यों मैं बहती|
बेरोक, बेटोक, बिन अंकुश
भिगोती जीवन के काग़ज़ को |
माना कि पढ़ने को नग़में नहीं लिखेगी
बहती स्याही
माना कि तुम्हे कुछ कह ना पाए
बहती स्याही|
बहकर वो बेकार होगी,
काग़ज़ को भी बर्बाद करेगी
पर मेरे भावों को साकार करेगी,
वो शब्दों का जाल पार करेगी|
कई बार रोए हैं ख़ुद,
आज टूटे पेन को को भी रोने देते हैं|

दैव्य तुम हो

तुम सौम्य हो, सौंदर्य हो
रौद्र का पर्याय तुम ही
शृंगार रस का मूल तुम हो
वीर सींचती राग तुम हो
विजय शंख नाद तुम हो
हर युद्ध में कलंकित
हार का अभिषाप तुम हो
महापुरूषों के दाह की
द्रौपदी, जानकी तुम्ही हो
आत्मा की क्रूरता से साक्षर
देह का व्यापार तुम हो
वात्सल्य हृदय है तुम्हारा
क्षमा का भंडार तुम हो
प्रसूती की पीड़ा तुम हो
आँगन की लज्जा तुम हो
प्रियतम से चोट खाई
आँचल छिपाती तन नील तुम हो
अश्रू को आँख तिनका बताती
ब्याहता भी तुम ही हो
गंभीर तुम हो, धीर तुम हो
एक कलेजे में संसार बाँधती
विफल हाथों को संकल्प बाँटती
प्रियसी तुम हो, मातृ तुम हो
हो अथक संयमी तुम्ही
तद्दपि पौरूष का अपमान तुम हो
वैराग्य का काल तुम हो
परम पराक्रमवान तुम ही
फिर भी तेज हारती यौवन तुम्ही
करूणा का, कौशल का, कर्तव्य का
माप तुम ही,
निःसंदेह दैव्य तुम ही
निःसंदेह दैव्य तुम ही!

India 2040

Disclaimer: Things written here might offend some. But that is no issue, to be offended is the objective. However, one must remember that this is purely a work of fiction.

The results for the 12th are out today and my neighbour’s son has passed with flying colours, rather a topper of his batch. I excitingly queried about his career dreams, and with a 56-inch chhaati (now a benchmark for ‘handsome quotient’ among the teenagers) he proudly announces that he will be appearing for the entrance exam for 21 Gau Rakshak Battalion under the Ministry of Defence.

It became his dream job after the millennium revolution of cow protectionism. He explained how, in a school project, he did a comparison of the anatomy of a cow and a buffalo to show what makes the holy mother and the calves, oh sorry, the half-brothers worth the stay in the Gau Mata Kalyan Griha. He has been attending the coaching classes for the exam since standard 9 under the Skill India movement hosted by Rashtriya Swayamsevak Sangh, endowing free education on such subjects and clothes (though of the particular shade Khaki—the colour of nationalists. It could even be kesariya, just like the new jerseys of Indian cricket team, but then Khaki represents service). Well, his parents are very supportive too, as the battalion pays really well, enough to support the family which has been through the turmoil of momos and noodles.

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