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The Thought Leakage

Writings of Expressions and Experiences

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Short story

आग लगी

अहो क्या बात हुई
कि घर लड़की ना आई
कहीं दिवानी फिरती वो
नाम डुबा ना आई|
बरसाती आधी रात गई
ना ख़बर करी
कई परवाने हुआ होंगे
जो बला बुलाती कहीं
उन्हीं में उसकी रात कटी?
लगे पड़ोसी बात बनाने
कि क्या बात हुई,
कि रात गई पर
घर लड़की ना आई?
पिता आँख फिर अनल भरी
जो आई ना भीतर एक घड़ी
तो मुहँ फेरे उल्टे लौट चले
जो आ गई नज़र, गर हाथ पड़ी
तो ख़ुदा ख़ैर करे उसकी
वो दोज़ख की आग जले |
आग जले, आग जले|
गला कलम ना किया अगर,
तो मैं भी उसका बाप नहीं|

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केकारव

कालीजाई का ढ़लता सूरज,
मखमली लहरों पर
बिछी लालिमा के आमुख
पँखों की छटा बिखेरे बैठा मोर|
आह! अद्भुत दृश्य,
किसी प्रियसी की याद दिलाता|
सबने सब देखा,
बस जंगल की ओर
उठते केकारव में घुली
उस प्रियसी से मिलन की
पुकार न सुनी|

A holiday less expected: From outpouring emotions to encountering reality

A few hours after returning from a memorable trip, I write this with my heart going back to the moments of peace and glee. So much so, that I prefer to write about this trip to Puri rather than any other trip taken in the holidays two months back.

Evening 7:30, plan confirmed for the trip, for the celebration of one of our friend’s birthday. Morning 5:00am, we were all lost at how unprecedented a day can be.

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विच्छेद

आज फिर आँखों के सामने वो सौम्य रूप बार याद आ रहा है| शांत, गंभीर पर उतना ही हँसमुख| एक हल्की सी मुस्कान भी बाकियों के खुश दिखने की सौ चेष्टाओं से ज़्यादा सच्ची लग रही थी| वो गौरव है–सुदृढ़ शरीर, गहरी आँखे, उसके अभिन्न से कद को भिन्न बनाते वो कंधे| व्यंग्य या विरोध की चोट करने से पहले, उन होठो का हल्का मुस्कुराना…आह!

क्यों, क्या हुआ? हूँ मैं महेश की विवाहिता, है मेरा समाज के अबरब के चश्मे में दिखता दो बच्चों और सास-ससुर सहित एक भरा-पूरा परिवार| मेरे जीवन में रिवाज़ों का अंकुश लगाया जा सकता है, मेरी सोच इस बंधन से मुक्त है, स्वच्छंद है| मेरी शर्म मेरे कमरे के पर्दे के पीछे ख़त्म हो जाती है| यहाँ मेरा संसार बसता है–कुचली इच्छाओं का, त्रस्त भावनाओं का, असम्मानित अधिकारों का|

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कहो कि हमसे ग़िला है क्या?

कहाँ तो इशारों की अठखेलियाँ करोगे,
कहाँ तो रस भरे नग़मे कहोगे,
रसिकों की महफ़िल में,
यूँ नज़रे फेरे दूर बैठे हो,
कहो कि हमसे ग़िला है क्या?

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पानी पर बसा शहर

पानी पर बसा शहर,

चादर कोहरे की ओढ़े

किनारों पर स्नेहातुर कमल खिले,

बाह्य शांत, भीतर अस्थिर

तरल भावनाओं का

शहर अभिलाशाओं का

कोहरा वेदनाओं का

और कमल है उनका जो पार कर चले ये शहर,

और पहुँचे हैं तृप्तिमय सीमा पर |

Solving Matters: The Gender Differences

Note: I intend no gender bias here but write by few experiences that I had in past few days. It is not about which way is better.

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The Villain is You

Everyone is the protagonist of their tale. And if they are, then possibilities are high that they must even be the villain of someone else’s. If you are the good, then you are even the bad. Think of that somebody’s story where you could be the villain. What, you can’t remember one? Did you just say to yourself that you have been pretty nice to everyone? Oh, how I feel poor for you. You are missing that grey shade of human self, the shade which makes you human.  One doesn’t remember such occasions because they are not a part of their down days, their stories of struggles or their stories of heroism. These are somebody other’s.

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Hatred and Indifference

Hatred is not as bad as being indifferent. Hatred means one has a corner of the heart dedicated to for generating the impulses of hate; indifference, on the contrary, refers to the unacknowledged and unfelt presence of a person, having not a single atom of your body affected by a person’s happiness or sorrows. A total ignorance sans feelings—a sign of inexistent in this big universe.

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