कई बरस हुए घर गए। घर यानि वो जगह जहाँ सब अपने रहते हो। अपनों के साथ ही तो रह रही हूँ, फ़र्क इतना है कि जहां के हम हैं वहाँ नहीं हूँ। और उस जगह यानि, जहाँ हमारी पुश्तें रहती आई थीं, वहाँ जब आखिरी बार गई थी एक नज़र मारने और उस ख़ूबसूरत से अनछुए गाँव में ख़ुद का अस्तित्व पहचानने तो पाया कि अपने अविकसित होने कि छाप छोड़ वहाँ बाकि सब बदल रहा था। और इन सब में सबसे पहले जो कुछ छूट रहा था, उसमें भाषा अव्वल नंबर पर थी। मेरी भाषा भोजपुरी की।

घर में ब्याह था, पुरानी आँगन वाली शैली में बने घर में महक आ रही थी देसी खास पकवानों की। सोहर गाए जा रहे थे। गारि गाई जा रही थी। भला गारि भी कोई गाने की चीज़ होती है? बिल्कुल, आइए कभी आज़मगढ़, देवरिया, बलिया या गोरखपुर, और मज़ा लें इस गुड़ सी मीठी ज़ुबान का जिसमें गालियाँ भी गाकर बड़े प्यार से मारी जाती हैं, और उतने ही प्रेम से उनको सुना भी जाता है। यहाँ ब्याह एक घर में नहीं होता, पूरा गाँव एक-एक चीज़ जुटाकर हिस्सा बनता है। जहाँ की भाषा सिर्फ भारत के ही कई प्रांतों में नहीं, बल्कि विश्व के कई देशों में बोली जाती है और जिसकी कुछ सौ वर्षों पहले तक अपनी लिपि भी थी।

कजरी, लाचारी, गारि, होरी, सोहर, निर्गुण और ऐसी कई और गीत शैलियाँ जो आपने कभी नहीं सुनी हों। निर्गुण का अगर सबसे करीबी पर्याय ढ़ूँढ़ा जाए तो वो सूफी होगा। पर फिर भी सूफियाना अंदाज़ से कहीं अलग। अपने आँचल में भोजपुरिया समाज कई रहस्य दबाए हुए है जो कहीं रोज़ बन रहे और बड़े शौक से मज़ाक उड़ाए जाने वाले ‘मीम्स’ में कुचला जा चुका है। वो सोशल पोस्ट्स जिनमें कहा जाता है कि देखो, यदि भोजपुरी में यह फिल्म होती तो शीर्षक कुछ एस तरह का होता। और आप जनाब इस बे-सिर-पैर के पोस्ट में ठहाके लगा-लगा दोस्तों को टैग करते हैं, ये बिना जाने कि जो आप को परोसा गयो है, वो भोजपिरी नहीं। जनाब, यह भाषा ‘ठीक बा’ से कहीं गहरी है। इसकी संस्कृति भी किसी और समाज और भाषा जौसी विस्तृत और अथाह है।

जो बचा-खुचा था उसे यहाँ की फिल्म इंडस्ट्री ने धो दिया। लोगों ने भी मान लिया कि ये रिक्शेवालों और मज़दूरों का बोली है, और यो एक मिथ्या छवि बना ली कि असभ्य कोई है तो वो भोजपुरिया लोग हैं। यहाँ संगीत है तो केवल ‘लगावे लू लिपिस्टिक’ ही है, जो खान-पान है वो लिट्टी-चोखे तक सीमित है। हालत यूँ है कि शहर जाकर चार महीने रहे लोग वापस आ हिंदी में बात-चीत करना पसंद करते हैं और किसी त्योहार या उत्सव में रिश्तेदारी में जाकर भोजपुरी से कतराते ही है। वहीं कई ऐसे लोग भी हैं जो अपने बच्चों को ये भाषा नहीं सिखाना चाहते। भला जिस भाषा पर गँवारपन का ठप्पा लग गया हो, उसे कौन ही बोलना चाहेगा? जब इन इलाकों में ही हिंदी शिक्षित होने की पहचान बन गई है, तो कौन बोले इसे?

आप खुद ढ़ूँढ़ें तो अपने आस-पास ऐसे कम ही लोग पाएंगे जोकि इसका इस्तेमाल कर रहे हों। एक मराठी को आप दूसरे मराठी से बेहिचक अपनी भाषा में बात करते देख सकते हैं, वहीं तेलुगु, तमिल, पंजाबी, बंगाली जैसी भाषाएँ आम बोल-चाल में सुनने को मिल जाएंगी। ऐसा नहीं कि सब बुरा है। कई हैं जो बेहिचक इसे बोलते और अपने ही अंदाज़ में इसकी ठाठ बनाए हुए हैं। और इस ब्लॉग पोस्ट से भी मैं उसी तरफ एक छोटा सा कदम बढ़ाना चाहती हूँ और अपनी ज़ुबान, और मातृभाषा में हर दिन कुछ नया लिखने की कोशिश कर रही हूँ। आपसे भी अनुरोध है कि बिना व्याकरण समझे बनाए गए किसी भी भोजपुरी वाले ‘मीम’ को शेयर ना करें, आपका बड़ा आभार होगा। इस भूमिका के बाद की कुछ भोजपुरी में पढ़ने को ना मिले तो ये जायज़ नहीं होगा। शायद भूमिका को तौर पर ये सात सौ शब्द ज़्यादा लगें, पर इस कोशिश का पहला नमूना होने के नाते, इतना तो बनता है।———————

ए संइयाँ उधारी क करधनिया बिला गइल,

गइल पताले कि अकसवे खा गइल

जोहीं हाली हाली सगरी डगरिया,

हमरी करेजवा प बोझा बुझाता…

जाने कवन राहू घडिया में लिहनी ननदिया से माँग,

ए संइया बूझ परेसानी, रख हमार मान

ना मिली घरे त नवका कीन लइह ,

ना मिली ओइसन एजा त गोरखपुर चल जइह

ए संइया राख ली बचनिया हमार,

जोह लाई करधनिया जौन लिहनी उधार।

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