लिखती हूँ आज,
निब तोड़
स्याही से,
काग़ज़ पर फैल रही स्याही से|
चूंकि छंद-बद्ध नहीं कर सकती भावनाओं को
फैली स्याही लिखती मेरे भावों को|
कहती जो मैं कहती
बहती ज्यों मैं बहती|
बेरोक, बेटोक, बिन अंकुश
भिगोती जीवन के काग़ज़ को |
माना कि पढ़ने को नग़में नहीं लिखेगी
बहती स्याही
माना कि तुम्हे कुछ कह ना पाए
बहती स्याही|
बहकर वो बेकार होगी,
काग़ज़ को भी बर्बाद करेगी
पर मेरे भावों को साकार करेगी,
वो शब्दों का जाल पार करेगी|
कई बार रोए हैं ख़ुद,
आज टूटे पेन को को भी रोने देते हैं|

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