तुम सौम्य हो, सौंदर्य हो
रौद्र का पर्याय तुम ही
शृंगार रस का मूल तुम हो
वीर सींचती राग तुम हो
विजय शंख नाद तुम हो
हर युद्ध में कलंकित
हार का अभिषाप तुम हो
महापुरूषों के दाह की
द्रौपदी, जानकी तुम्ही हो
आत्मा की क्रूरता से साक्षर
देह का व्यापार तुम हो
वात्सल्य हृदय है तुम्हारा
क्षमा का भंडार तुम हो
प्रसूती की पीड़ा तुम हो
आँगन की लज्जा तुम हो
प्रियतम से चोट खाई
आँचल छिपाती तन नील तुम हो
अश्रू को आँख तिनका बताती
ब्याहता भी तुम ही हो
गंभीर तुम हो, धीर तुम हो
एक कलेजे में संसार बाँधती
विफल हाथों को संकल्प बाँटती
प्रियसी तुम हो, मातृ तुम हो
हो अथक संयमी तुम्ही
तद्दपि पौरूष का अपमान तुम हो
वैराग्य का काल तुम हो
परम पराक्रमवान तुम ही
फिर भी तेज हारती यौवन तुम्ही
करूणा का, कौशल का, कर्तव्य का
माप तुम ही,
निःसंदेह दैव्य तुम ही
निःसंदेह दैव्य तुम ही!

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