कालीजाई का ढ़लता सूरज,
मखमली लहरों पर
बिछी लालिमा के आमुख
पँखों की छटा बिखेरे बैठा मोर|
आह! अद्भुत दृश्य,
किसी प्रियसी की याद दिलाता|
सबने सब देखा,
बस जंगल की ओर
उठते केकारव में घुली
उस प्रियसी से मिलन की
पुकार न सुनी|

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