कहाँ तो इशारों की अठखेलियाँ करोगे,
कहाँ तो रस भरे नग़मे कहोगे,
रसिकों की महफ़िल में,
यूँ नज़रे फेरे दूर बैठे हो,
कहो कि हमसे ग़िला है क्या?

कहाँ तो हफ़्तों की दूरियों का हिसाब लोगे,
कहाँ तो हमारे आगमन से खिल उठोगे,
मुतमइन थे कि मिलन फिर होगा,
ख़ुश्क हो तुम ख़फ़ा दिखे,
कहो कि हमसे ग़िला है क्या?

कहाँ तो सर्द में तुम्हारे जेबों की ऊष्मा में सेकेंगे हाथ,
कहाँ तो ज़ख्मों पर ठंड़े फूँकों की छाँव होगी,
गहरी आँखों में डूबने के बदले,
तार तोड़ ज़ख़्म कुरेद रहे हो,
कहो कि हमसे ग़िला है क्या?

कहाँ तो बाहों का घेरा इंतज़ार करेगा,
कहाँ तो ऊँगलियों को तुम्हारे बालों का सुकूं मिलेगा,
अनजानों की इस कतार में,
तुम भी कुछ जाने जाने अनजान लगे,
कहो कि हमसे ग़िला है क्या?

 

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