बचा लो, बचा लो,

ये जो चंद जानें बची हैं,

जिन्हें कुचल जाने को कई आतुर हुए हैं

बता दो बता दो,

कि इनकी ख़ैर है किसी को,

जो दो मुल्कों के दोराहे पर खड़े हैं
संभालो संभालो,

इन नन्हों ने जो कुछ सपने पाले हैं

बिगड़े हुए बड़े जिन्हें तोड़े जा रहे हैं
बुझा दो बुझा दो

आबरू को जलाने जो मशालें जली है

वो गालों की लाली यूहीं रहे
जला दो जला दो

उस जन्नत की चाहत को

जो पलट दोज़ख में खींचे है

कुचल दो कुचल दो,

जो मारने को धर्म के मारे खड़े हैं

रोको उन्हें भी जिनके मुँह से भाले गिरे हैं
समेटो समेटो,

अपने जैसों को समेटो,

जो बीते दिनों से कुछ सीख पाएँ

जो फूलों सी नाज़ुक शांति को सींच पाएँ

चलो अब दिखाएँ कि कम है न ऐसे

जो लंबा सफर तय कर भी

तैयार हैं वहाँ तक पहुँचने को

जहाँ अमन ही अमन हो,

बेदाग़ वो श्वेत चादर हो

न ख़ून, न बारूद, न आँसू

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