शोर मचा था कुनबे में

फ़िर भी दिल में सन्नाटा

कहने को सौ बातें थी,

फ़िर भी मुहँ पर है ताला

भला कौन सुनता उसकी

जब गूँजें औरों की स्वर-माला |

उम्र अभी कच्ची सी थी,

सोचा, कहने को जन्म पड़ा है,

दो-चार अभी सुन ही लेते हैं |

क्या घटे औरों की सुन लेने से,

क्या पता कुछ ख़ास कह चलें

मौके तो कई बार मिलेंगे

अपनी जब हम कहा करेंगे |

यूँ ही कई साल गुज़र गए,

छुटकन अब बड़े हो गए

उम्र बत्तीस हो चली थी

सुनने की आदत यूँ लगी थी,

कि कह पाना भारी लगे था

सुनने में बड्डपन कहाँ बचा था

संकोच ऐसा पनप चुका था,

कि अब कभी कुछ कह न सके थें |

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