नज़्म अभी गीली सी थी, रो रोकर कुछ चार पंक्तियीँ लिखी थी|

 कसक अभी सौंधी सी थी, ज्यों गर्म तवे से अभी उतरी हो |

शांति अभी चुभन सी थी, कानों में जो गूँज रही थी |

घर-आँगन कुछ सहमा सा था, तिल-तिल सबको काट रहा था |

मीठे बोल गाली से थे, मन के घाव कहाँ भरे थे |

गला सभी का भारी सा था, रात आँखों में जो कटी थी |

झिंगुरों का जैसै रुदन मचा हो, शोर मचाने वही बचे थे |

माँ जैसे बुत बन बैठी थी, बच्चे बस सब भाँप रहें थे |

दिन ये भी कुछ आम सा होता, पर पिता अभी लौटे न थे |

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