आशाएँ दिखा रही थी खिड़की, बाहर का नज़ारा दिखा, जला रही थी खिड़की |

अंदर बैठी मैं गुम हूँ, बाहर के ख़यालों में

बाहर तलाशती हूँ अंदर का मंज़र…वो ठंडक वो मोहब्बत
वो बादलों का गुब्बारा बाहर बुलाता है

वो दूर गुम होते रास्ते मौके दिखाता है

 वहीं घर की रौनक बाँधे रखती है,

ये खिड़की बहुत ललचाती है,

सोचती हूँ परदे से इसे ढँक दू,

या फिर तोड़ चलूँ इन सीलीयों को?

सब क़िस्से तुम सुन चुके,

अब तुम्ही कहो किस ओर चलूँ |

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