तबियत थोड़ी नासाज़ भले थी
परिस्थितियाँ चाहे विषम रही हों
संयम उसका अडिग खड़ा था
चूंकि छूने को आकाश पड़ा था |

सौजन्य हृदय मिले न उसके
दसों ओर निराश हुआ था
कुंठित धीर हुआ न उसका
चूंकि छूने को आकाश पड़ा था |

दिवस-दिवस वो खट रहा था
रातों में विश्राम कहाँ था !
किंतु, अविचल हो, तूफ़ानों को ललकार रहा था
चूंकि छूने को आकाश पड़ा था |

परिश्रम कि तपती अग्नि में
अवगुण उसके पिघल चुके थे
सफलता की कूंजी में, कर्मठता की मिसाल बनेगा
नभ को अब वो पार करेगा |

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