वो आम का पेड़ ठूँठ खड़ा है,
मेरा बाग़ आज उदास पड़ा है |

खेला किए उसी की छाया तले
झूला झूले, गिल्ली खेली
गर्मी की वो लू भी खाई
कुल्फ़ी की महफ़िलें भी हुई
साग-सगों की खिल-खिली भी हुई

पर यहीं कई अलविदें लिखें
बरसों तक न आ पाने के
क़िस्से भी कहे-सुने
कई बाग़ यूहीं विरान हुए
परदेस बसे हैं सभी सयाने
जो कल यहीं बैठा किए |

लौटें तो अकाल पड़ा था |
वो आम का पेड़ ठूँठ खड़ा था |
वो बाग़ आज उदास पड़ा था |

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